वीआईपी का बंगला डूबे तो फुर्ती, आम आदमी की बस्ती डूबे तो चुप्पी…!
आज जब विधानसभा अध्यक्ष नरेंद्र सिंह तोमर के सरकारी बंगले में पानी भर गया, तो नगर निगम की पूरी टीम चंद मिनटों में मौके पर पहुँच गई और पानी निकालने में जुट गई।
लेकिन सोचिए — ये खुद नगर निगम की एक बड़ी नाकामी है।
शहर के सबसे सुरक्षित और व्यवस्थाओं से लैस क्षेत्र में अगर पानी भर रहा है, तो ये बताता है कि नगर निगम की तैयारी सिर्फ कागज़ों पर ही है।
वहीं दूसरी तरफ़, जब आम नागरिक अपने मोहल्ले या घर में इसी तरह की परेशानी से जूझता है —
•महीनों तक सुनवाई नहीं होती,
•शिकायतें दर्ज होती हैं लेकिन कार्रवाई नहीं,
•लोग गुहार लगाते रह जाते हैं लेकिन कोई नहीं सुनता।
जैसे ही कोई घटना वीआईपी के साथ हो जाती है, पूरा सिस्टम डर और दबाव में तुरंत हरकत में आ जाता है।
यही है हमारे सिस्टम की सच्चाई — जहां सम्मान नहीं, नाम और पद ही सुनवाई की गारंटी बन चुके हैं।
अब सवाल यह नहीं कि पानी कहां भरा…
सवाल ये है कि प्रतिक्रिया की रफ्तार सिर्फ पद देखकर क्यों तय होती है?
प्रवीण शर्मा

