25 जून 1975: जब लोकतंत्र पर लगा पहरा, आपातकाल के 50 साल पूरे, याद आया भारतीय इतिहास का सबसे काला दिन
भारतीय लोकतंत्र का काला अध्याय आज से ठीक 50 साल पहले, 25 जून 1975 को भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में एक ऐसा दिन दर्ज हुआ, जिसे ‘काला दिन’ कहा जाता है। इस दिन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने देश में आपातकाल (Emergency) की घोषणा की, जिसने संविधान, नागरिकों के मौलिक अधिकारों, प्रेस की आज़ादी को खत्म कर दिया और हजारों नेताओं को जेल में डाल दिया गया।
इसकी शुरुआत तब हुई जब इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इंदिरा गांधी के रायबरेली चुनाव को रद्द कर दिया। कोर्ट ने उन्हें चुनावी नियमों के उल्लंघन का दोषी माना और 6 साल तक चुनाव न लड़ने का आदेश दिया। जिससे उनकी कुर्सी पर संकट आ गया। यह फैसला उनके राजनीतिक करियर पर गंभीर संकट लेकर आया। सत्ता बचाने की बेचैनी में इंदिरा गांधी ने संविधान के अनुच्छेद 352 का दुरुपयोग करते हुए। 25 जून की रात राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद से आपातकाल की घोषणा पर हस्ताक्षर करवा लिए। इसके बाद पूरे देश में आपातकाल लागू हो गया।
इस दौरान जो कुछ हुआ, वह लोकतंत्र के लिए बहुत डरावना था। लोगों के मौलिक अधिकार खत्म कर दिए गए। अखबारों पर सेंसरशिप लगा दी गई। हजारों विपक्षी नेताओं, पत्रकारों और कार्यकर्ताओं को जेल में डाल दिया गया। आरएसएस (RSS) और कई संगठनों पर प्रतिबंध लगा दिया गया। संविधान में कई तानाशाहीपूर्ण संशोधन किए गए, जिससे प्रधानमंत्री को न्यायपालिका से ऊपर कर दिया गया।
आपातकाल के दौरान सरकार द्वारा लागू किए गए कई कठोर कदमों की देशभर में आलोचना हुई। लेकिन सभी प्रयासों के बावजूद सत्य को दबाया नहीं जा सका। आपातकाल की अवधि में डर का माहौल था। कोई सरकार की आलोचना नहीं कर सकता था। जो बोले, उसे जेल में डाल दिया जाता था। लेकिन धीरे-धीरे जनता में गुस्सा बढ़ने लगा। आरएसएस, विपक्षी दल और कई सामाजिक संगठनों ने छुपकर आंदोलन करना शुरू कर दिए। प्रेस और विपक्ष की चुप्पी के बीच भी जनता के भीतर आक्रोश धीरे-धीरे उबलता रहा।
आख़िरकार मार्च 1977 में चुनाव हुए। इस चुनाव में कांग्रेस पार्टी की बुरी तरह से हार हुई। इंदिरा गांधी खुद रायबरेली सीट से चुनाव हार गईं। जनता पार्टी ने सरकार बनाई और देश में दोबारा लोकतंत्र लौटा।
आज, आपातकाल के 50 साल बाद, यह दिन हमें याद दिलाता है कि लोकतंत्र की रक्षा, सतर्कता, जनजागरूकता और सत्य की शक्ति से ही संभव है। यह दिन एक चेतावनी है कि अगर नागरिक अधिकारों की रक्षा नहीं की गई, तो तानाशाही दोबारा लौट सकती है।

