सिंधिया और सांसद की रार कैसे हेमंत लगायेंगे ग्वालियर बीजेपी की नैया पार।
ग्वालियर में भाजपा स्पष्ट रूप से दो प्रमुख धड़ों में बंटी हुई दिखती है। एक धड़ा केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया का है, जिन्होंने कांग्रेस छोड़कर भाजपा का दामन थामा और अपने साथ एक बड़ा समर्थक वर्ग भी लाए हैं। दूसरा धड़ा ग्वालियर के वर्तमान सांसद भारत सिंह कुशवाह का है, जो लंबे समय से भाजपा से जुड़े हुए हैं और स्थानीय स्तर पर उनकी अपनी पकड़ है।
कागजों पर ये दोनों नेता एक ही पार्टी के हैं, लेकिन ज़मीनी हकीकत कुछ और ही बयां करती है। इनके समर्थकों के बीच की दूरी इतनी स्पष्ट है कि इसे अनदेखा करना मुश्किल है। अक्सर यह देखा गया है कि सिंधिया समर्थक अपने कार्यक्रमों के होर्डिंग्स और बैनरों में भारत सिंह कुशवाह की तस्वीर लगाना पसंद नहीं करते। ठीक इसी तरह, जब भारत सिंह कुशवाह के कोई कार्यक्रम होते हैं, तो सिंधिया समर्थक खेमा उसमें कम ही नजर आता है। और यदि सिंधिया स्वयं किसी आयोजन में होते हैं, तो भारत सिंह कुशवाह के समर्थक अक्सर नदारद रहते हैं या उनकी उपस्थिति बेहद कम होती है।
यह केवल कुछ नेताओं के बीच का मतभेद नहीं है, बल्कि इसका सीधा असर निचले स्तर के कार्यकर्ताओं पर भी पड़ता है। कार्यकर्ता असमंजस में रहते हैं कि वे किस खेमे से जुड़ें या किसके प्रति अपनी वफादारी दिखाएं। यह स्थिति अंततः पार्टी के संगठनात्मक ढांचे को कमजोर करती है और आगामी चुनावों में इसका नकारात्मक प्रभाव भी पड़ सकता है।
हेमंत खंडेलवाल की अग्निपरीक्षा और आगे की राह
ऐसे में, भाजपा के नवनियुक्त प्रदेश अध्यक्ष हेमंत खंडेलवाल के सामने एक बड़ी और महत्वपूर्ण चुनौती है। उन्हें न केवल प्रदेश स्तर पर संगठन को मजबूत करना है, बल्कि ग्वालियर जैसी अहम जगहों पर मौजूद इस तरह की गुटबाजी को भी खत्म करना होगा।
खंडेलवाल को सबसे पहले इन दोनों धड़ों के बीच विश्वास का पुल बनाना होगा। उन्हें सिंधिया और कुशवाह दोनों को एक मंच पर लाने के लिए प्रभावी रणनीति बनानी होगी। यह समझना महत्वपूर्ण है कि केवल ऊपरी तौर पर एक साथ दिखना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि कार्यकर्ताओं के स्तर पर भी एकजुटता लाना जरूरी है। उन्हें यह सुनिश्चित करना होगा कि किसी भी नेता के कार्यक्रम में दूसरे नेता या उनके समर्थकों को जानबूझकर नजरअंदाज न किया जाए।
संगठन को मजबूत करने के लिए खंडेलवाल को कार्यकर्ताओं को यह संदेश देना होगा कि पार्टी सर्वोपरि है और व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं से ऊपर उठकर उन्हें एकजुट होकर काम करना होगा। यह उनके लिए एक बड़ी ‘अग्निपरीक्षा’ से कम नहीं है। यदि वे ग्वालियर में इस अंदरूनी खींचतान को सफलतापूर्वक सुलझा पाते हैं, तो यह न केवल ग्वालियर भाजपा के लिए, बल्कि पूरे प्रदेश में पार्टी के लिए एक सकारात्मक संदेश होगा।

